अंबुबाची के पवित्र काल में देवी-साधना की शक्ति कई गुना अधिक प्रभावी मानी जाती है। इस अवधि में किया गया मंत्र-जप, हवन या कोई भी तांत्रिक अनुष्ठान अत्यंत शुभ फल प्रदान करता है। विशेषतः जब अष्टमी का दिन शनिवार के साथ संयोजन में आता है, तब साधना की सिद्धि का योग और प्रबल हो जाता है। योग्य साधक इस शुभ मुहूर्त से अपनी 21 दिवसीय साधना का आरंभ कर सकता है। यदि चाहें, तो अन्य सामान्य दिनों में भी यह साधना पूर्ण प्रभाव के साथ की जा सकती है।

अंबुबाची के दिनों में देवी की कोई भी साधना—मंत्र, जप, हवन या प्रयोग—करना विशेष रूप से फलदायी होता है।
फिर भी अष्टमी + शनिवार का योग इस साधना का सबसे उत्तम समय माना गया है।

साधक चाहे तो इस दिन से 21 दिवसीय साधना प्रारंभ कर सकता है, अथवा अन्य दिनों में भी यह साधना कर सकता है।


🔱 साधना-विधि

1. दिशा एवं लेखन-विधि:
उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठें।
अपने सामने एक स्टील की थाली रखें और उसमें कामाख्या बीज मंत्र (त्रीं) को कुमकुम और घी मिलाकर लिखें।

2. धूप और दीपक:
तीन धूप या तीन अगरबत्ती प्रज्वलित करें तथा घी के तीन दीपक जलाएँ।

3. भोग/प्रसाद:
तीन अनार या तीन लाल रंग की मिठाई देवी को अर्पित करें।
साधना पूर्ण होने के बाद यही प्रसाद आपको स्वयं ग्रहण करना है।

4. वस्त्र और आसन:
पूरी साधना में लाल वस्त्र पहनें।
यदि लाल धोती उपलब्ध न हो तो लाल रंग की शर्ट, टी-शर्ट या कुर्ता भी पहन सकते हैं।
लाल आसन पर बैठकर जप करना श्रेष्ठ है—परंतु यदि यह उपलब्ध न हो तो किसी भी आसन पर धुला हुआ लाल कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर बैठकर मंत्र-जप किया जा सकता है।

5. संकल्प एवं मंत्र-जप:
अपनी आवश्यकता या इच्छा के अनुसार संकल्प लें।
अब लाल माला से कामाख्या बीज मंत्र “त्रीं” का एक माला या पाँच माला जप करें।
इच्छा होने पर आप कामाख्या के अन्य सिद्ध मंत्रों का भी जप कर सकते हैं।