• पितरों को प्रसन्न करने के लिए पितृपक्ष का समय सर्वोत्तम है।
  • यह उपाय सरल और तीव्र प्रभावी है, बिना जटिल पूजा-पाठ के।
  • धन हानि, पारिवारिक कलह, संतान बाधा, मन अशान्ति, बिगड़े कार्य आदि में लाभकारी।

साधना/क्रिया विधान

  1. समय: पितृपक्ष के दौरान, सुबह 4 बजे जागें।
  2. प्रारंभिक क्रिया:
    • मुख्य द्वार के बाहर थोड़ी जमीन पर झाड़ू लगाएँ।
    • फिर उस स्थान पर पानी छिड़कें।
  3. अर्घ्य:
    • घर की स्त्री मुख्य द्वार पर पानी का एक लोटा अर्घ्य दे।
    • यह क्रिया प्रतिदिन जीवन भर की जा सकती है।
  4. भोजन सामग्री तैयार करना:
    • नहा धोकर खीर और पूड़ी बनाएं।
    • भोजन को पत्तल में रखें, पानी का गिलास भी साथ रखें।
  5. स्थान चयन और आसन:
    • दक्षिण दिशा की ओर मुख करके छत या खुले स्थान पर बैठें।
    • सामने सफेद आसन बिछाएं और उस पर पत्तल रखें।
  6. पितरों का आवाहन:
    • हाथ में चावल लेकर मानसिक रूप से पितरों का आवाहन करें।
    • पितरों को आसन पर बैठाने के लिए चावल डालें।
  7. भोजन अर्पित करना:
    • खीर, पूड़ी और सब्ज़ी का भोजन पितरों को कराएं।
    • 10–12 मिनट वहाँ बैठकर मानसिक प्रार्थना करें।
  8. समापन:
    • पितरों को प्रणाम करें और मानसिक आशीर्वाद लें।
    • कुछ पूड़ी कौए, गाय, कुत्ते आदि को खिलाएँ।
    • स्वयं भोजन करें और दैनिक कार्य करें।
  9. अवधि:
    • इस क्रिया को लगातार 15 दिन करें।
    • अमावस्या या किसी विशेष शुभ दिन पर इसे दोहरा सकते हैं।

सारांश तालिका

विषयविवरण
दिनपितृपक्ष के 15 दिन
समयसुबह 4 बजे
वस्त्रसफेद (साफ और पवित्र)
आसनसफेद
भोगखीर, पूड़ी, सब्ज़ी, पानी
दिशादक्षिण मुख
पूजनपितरों का आवाहन (मानसिक)
कवच प्रयोगनहीं
विशेष ध्यानमानसिक प्रार्थना और श्रद्धा बनाए रखें

सावधानी / नियम

  • क्रिया सरल और श्रद्धा सहित करें, जल्दी-जल्दी नहीं।
  • भोजन और आसन सफेद रंग का हो।
  • खीर-पूड़ी अन्य जीवों को भी थोड़ी मात्रा में खिलाएं।
  • इस प्रयोग को 15 दिन लगातार करें।
  • पितरों की कृपा मिलने पर घर में शांति, रौनक और कार्यों में सफलता होगी।