तंत्र-शास्त्र में भैरव को चेतना के परम जाग्रत रूप,
“टाइम-ब्रेकर ऊर्जा”
और
“सर्व-विघ्न-नाशक तत्त्व”
का प्रतीक माना गया है।

भैरव साधना का मूल उद्देश्य किसी भी कार्य को बाहरी बल से सिद्ध करना नहीं, बल्कि साधक की एकाग्रता, साहस, और ऊर्जाओं के प्रवाह को इस स्तर तक उठाना है कि उसके लिए कठोर से कठोर परिस्थिति भी कार्य-पूरक बन जाए। इसीलिए इसे “सर्व-कार्य-सिद्धि” कहा गया है—क्योंकि साधक की चेतना इतनी तीक्ष्ण हो जाती है कि अवरोध स्वयं हटते चले जाते हैं।

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