बीर वे शक्तियाँ होती हैं जिन्हें रक्षक स्वरूप, अंग-विद्या स्वरूप तथा किसी देव या शक्ति के सेवा-दूत के रूप में माना जाता है। यह साधारण वीर-शहीदों से भिन्न होते हैं, क्योंकि जो युद्ध में लड़ते-लड़ते शहीद हो जाते हैं—जैसे गोगाजी वीर, जाहरवीर, तेजाजी वीर—उन्हें वीर लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है; लेकिन तांत्रिक परंपरा में ‘बीर’ एक विशेष शक्ति-स्वरूप का द्योतक होता है। यह किसी शक्ति के अधीन, उसके रक्षा-कार्य में तत्पर और ऊर्जा-रूप में सक्रिय होता है। इसलिए बीर का स्वरूप उस शक्ति के स्वभाव के अनुसार ही होता है—यदि शक्ति तामसिक है तो उसका बीर भी तामसिक होगा, यदि शक्ति उग्र है तो बीर भी उग्र-रूप में कार्य करेगा।

इसी कारण बीरों के प्रकार और स्वरूप बहुत अधिक हैं—जैसे महाबीर टोंटिया बीर, नरसिंह बीर, अवघट बीर, और अनेक अन्य। साधकों में इस बात को लेकर मतभेद भी मिलते हैं, क्योंकि कोई बीरों की संख्या 52 बताता है, तो कोई उससे ज्यादा। तंत्र-परंपरा में बीर किसी एक स्थिर संख्या से बंधे नहीं होते, बल्कि विभिन्न सिद्ध परंपराओं, कुलों और साधना-मार्गों में उनकी संख्या, ऊर्जा और कार्य-क्षेत्र बदलते रहते हैं।

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