अनेक साधक हमसे पूछते हैं कि शिव को गुरु बनाने की विधि क्या है, या किस प्रकार शिव को अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक बनाया जाए। परंतु यह प्रश्न भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि यदि आप शिव को गुरु बना भी लें, तो क्या आप उनके आदेशों, संकेतों और दिव्य मार्गदर्शन को पहचान पाएंगे? उसे समझकर धारण कर पाएंगे?

जैसे हर साधना गुरु के बिना अपूर्ण मानी जाती है, वैसे ही साधना में गुरु का होना अत्यंत अनिवार्य है। सर्वोत्तम यह है कि साधक एक वास्तविक, जीवित गुरु को खोजें ताकि वे प्रत्यक्ष मार्गदर्शन, समाधान और सुरक्षा प्राप्त कर सकें।
किन्तु जिन साधकों को गुरु प्राप्त नहीं हो पा रहे हैं, वे निम्नलिखित विधि से शिव को अपने गुरु रूप में स्थापित कर सकते हैं।

विधि — शिव को गुरु रूप में स्वीकार करना

● किसी शांत और स्थिर स्थान पर आराम से बैठ जाएँ।

● शिव का ध्यान करते हुए निवेदन करें:

“हे शिव, मैं आपको अपने गुरु रूप में स्वीकार करने का आग्रह कर रहा हूँ। कृपया मुझे अपने शिष्य के रूप में अंगीकार करें।”

● दोनों हाथ जोड़कर ऊपर ब्रह्मांड की दिशा में उठाएँ और तीन बार घोषणा करें:

“अखिल अंतरिक्ष साम्राज्य में मैं घोषणा करता हूँ—
शिव मेरे गुरु हैं, मैं उनका शिष्य हूँ।
शिव मेरे गुरु हैं, मैं उनका शिष्य हूँ।
शिव मेरे गुरु हैं, मैं उनका शिष्य हूँ।
तथास्तु। घोषणा दर्ज हो। हर हर महादेव।”

● यह घोषणा पूरी होते ही शिव साधक को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।

गुरु को साक्षी मानकर जीवन के कार्य करना

जिस भी महत्त्वपूर्ण कार्य का आप आरंभ करें, पहले शिव को साक्षी बनाकर विनयपूर्वक कहें:

“शिव, आप मेरे गुरु हैं और मैं आपका शिष्य हूँ।
आपको साक्षी बनाकर यह कार्य करने जा रहा हूँ।
इसकी सफलता के लिए मुझे दैवीय सहायता और सुरक्षा प्रदान करें।”

इससे कार्यों में रुकावट नहीं आती और साधक पर दैवीय कृपा बनी रहती है।


दैनिक साधना

● प्रतिदिन गुरु मन्त्र सवा घंटे बिना माला जाप करना चाहिए |


गुरु दक्षिणा

शिव को गुरु दक्षिणा स्वरूप उनकी प्रियतम वस्तु — ‘राम नाम’ — अर्पित करें और कहें:

“हे शिव, मैं गुरु दक्षिणा के रूप में राम-नाम का जप आपको समर्पित करता हूँ।
मेरे हृदय में स्थित होकर इसे स्वीकार करें।”


गुरु मंत्र

शिव के जिस मन्त्र को गुरु मन्त्र मानकर ग्रहण कर रहे है उस मन्त्र को पहले भोजपत्र पर लिखकर रख लेना चाहिए शिव जी के आगे और उसे उठाकर माथे से लगाकर ग्रहण करा जाता है |


महत्वपूर्ण सावधानी

उग्र साधनाओं के समय किसी योग्य गुरु से सलाह अवश्य लें।
क्योंकि यदि आप शिव से साधना की आज्ञा मांगें और शिव संकेत दें कि—

“अभी मत करो, तुम इसके योग्य नहीं। कुछ समय बाद करना।”

तो क्या आप उस दिव्य निर्देश को पहचानकर मान पाएंगे?
इसी पर गंभीर ध्यान देना आवश्यक है।

विशेष सुचना :- हमारा मत ये है की हम शिव जी के शिष्य बनने लायक पहले बने पात्रता सिद्ध करे तभी हमे उन्हें गुरु बनाना चाहिए ,गुरु बनाने के बाद चेला गलती करता है तो गुरु से पिटाई की उम्मीद पहले ही कर लेनी चाहिये |गुरु बनाकर अगर आप कुकर्म करने लगे तो पिटाई होगी शत प्रतिशत |गुरु बनाने से पूर्व मानसिक शुद्धता देह शुद्धता करना जरूरी होता है ,इसलिए लोग पहले अलग अलग स्नान करते है ,पंचामृत स्नान ,दुग्ध स्नान आदि आदि |जहाँ तक हो आसपास का देहधारी गुरु बनाना उतम है क्योंकि भगवान के संकेतो को समझने का सामर्थ्य आपमें कब आये ये कह नही सकते है ,देह्धारी गुरु भी अपने से दूर का नही बनाना चाहिए क्योंकि मुश्किल में गुरु पास कैसे जायेंगे |और एक बात अधिक शिष्यों वाला गुरु भी किसी काम का नही वो भी आपको समय नही देते है | कहावत भी है ” पानी पीना छानकर और गुरु बनाना जानकर “