November 19, 2025 महायोनि पूजा तंत्रमार्ग के उन प्राचीन और गूढ़ रहस्यों में से एक है, जिसे दक्षिणाचार, वामाचार, अघोराचार और कौलाचार जैसी अनेक गुरुपरंपराओं और उपासना-विधानों के माध्यम से समझा जाता है। दुर्भाग्य से आधे-अधूरे ज्ञान वाले नकली गुरुओं और कूपमंडूक संप्रदायों ने इस महान मार्ग को भ्रमों से भर दिया है, जबकि तंत्र को वास्तविक रूप में समझना केवल सद्गुरु की सन्निधि, पूर्ण अभ्यास और सही उपासना से ही संभव है। तंत्र के 64 आयाम हैं, और प्रत्येक आयाम में एक विशिष्ट तंत्र स्थापित है। भारत में इसके दो प्रमुख रूप—दक्षिण मार्ग और वाम मार्ग—विशेष प्रसिद्ध हैं। परमेश्वर सदाशिव के पाँच मुखों में से तीन मुखों से तीन मुख्य तांत्रिक प्रवाह उत्पन्न हुए: दक्षिण मुख से दक्षिणाचार, वामदेव मुख से वामाचार और अघोर मुख से अघोर पंथ। तंत्र के सर्वोच्च स्तर पर अघोर और कौल मार्ग स्थित हैं, जहाँ दस महाविद्याओं, कालभैरव और अष्ट भैरवों, महाकाल शिव, महाकाली, श्मशान काली, उग्र काली और वाम काली जैसी परम शक्तियों की साधना की जाती है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि वेदाचार से ऊपर वैष्णवाचार, उससे ऊपर शैवाचार, उससे श्रेष्ठ दक्षिणाचार, दक्षिणाचार से ऊपर वामाचार, वामाचार से श्रेष्ठ सिद्धांताचार और अंत में सिद्धांताचार से भी श्रेष्ठ कौलाचार है। इन्हीं 64 तंत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण तंत्र है—योनि तंत्र, अर्थात माँ कामाख्या का तंत्र, क्योंकि देवी कामाख्या स्वयं कामरूप क्षेत्र में योनि-रूप में विराजती हैं। इनके इस स्वरूप की साधना मंत्र, स्तोत्र, जप और उपासना के माध्यम से की जाती है, जिसके फलस्वरूप साधक को वे सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं जो अन्य मार्गों में बारह वर्ष श्मशान साधना या बारह वर्ष शिव-सेवा से मिलती हैं—चाहे वे 18 सिद्धियाँ हों, 24 महा-साधनाओं की सिद्धियाँ, वाक् सिद्धि, पंचतत्व सिद्धि, पंचकोष सिद्धि या नवचक्र सिद्धि। सृष्टि की मूल सत्ता स्वयं आद्य पराशक्ति हैं, जिनके संकल्प से ब्रह्मा, विष्णु और महेश की उत्पत्ति हुई। वे मणिद्वीप की अधीश्वरी हैं, परमब्रह्म महाशिव—मदन कामेश्वर—की अर्धांगिनी हैं और कामरूप में कामेश्वरी, कामाख्या तथा राजराजेश्वरी के रूप में विराजती हैं। इन्हें कुरुकुल्ला कहा गया है—जहाँ ‘कुरु’ का अर्थ आरम्भ करने वाली और ‘कुल्ला’ का अर्थ पाँच कुलों (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, भैरव और शक्त कुल) को धारण करने वाली होता है। ये देवी ही महायोनि के रूप में पूरी सृष्टि को जन्म देती हैं और अंत में उसे अपने भीतर समेट लेती हैं; उस अवस्था में न त्रिदेव रहते हैं न सृष्टि—परंतु देवी और सदाशिव महाकाल तब भी शून्य में स्थित रहते हैं। माँ कामाख्या के इसी महायोनि स्वरूप की उपासना को ही योनि तंत्र कहा गया है, जिसका ज्ञान स्वयं भगवान महादेव ने पार्वतीजी को और भैरव ने माँ भैरवी को दिया था। अधूरे ज्ञान से हर जगह काम-वासना जोड़ देना अज्ञानता है, क्योंकि 84 लाख योनियों की रचना जिन देवी ने की और जिनकी शक्ति से पूरी सृष्टि चलती है, वही माँ कामाख्या, माँ कामेश्वरी, भगवती परमेश्वरी इस तंत्र का मूल हैं। इस तंत्र का अंतिम उद्देश्य वासना नहीं, बल्कि देवी की उपासना, साधना, सेवा और भक्ति के माध्यम से परम मोक्ष प्राप्त कर परमधाम में प्रतिष्ठित होना है—और यह दुर्लभ कृपा करोड़ों में किसी एक को ही प्राप्त होती है। Share this… Facebook Whatsapp Messenger Twitter Linkedin Threads Telegram Email Copy